रकारी बैंकों के मैनेजमेंट में निजी भागीदारी को बढ़ावा दें / सरकारी बैंकों के मैनेजमेंट में निजी भागीदारी को बढ़ावा दें

सरकारी बैंकों के मैनेजमेंट में निजी भागीदारी को बढ़ावा देंकरंट अफेयर्स पर 30 से कम उम्र के युवाओं की सोच विनोद राठी, 20 नेकीराम शासकीय कॉलेज, रोहतक facebook : vinod.rathee.921 हीरा...
Bhaskar News Network
Feb 27, 2018, 02:55 AM IST
करंट अफेयर्स पर 30 से कम उम्र के युवाओं की सोच

विनोद राठी, 20

नेकीराम शासकीय कॉलेज, रोहतक

facebook : vinod.rathee.921

हीरा कारोबारी नीरव मोदी ने जिस तरह पंजाब नेशनल बैंक में सेंध लगाई है, वह नई नहीं है। आंकड़ों के मुताबिक 2012 से दिसंबर 2017 तक 25,600 बैंक घोटाले सामने आ चुके हैं। जिससे बैंकों की कार्यप्रणाली पर संदेह होना स्वभाविक है। ऐसे में आर्थिक विकास की तरह बैंकिंग तंत्र में अपेक्षित सुधारों को भी गंभीरता से लिए जाने की आवश्यकता है। भविष्य में बैंक घोटाले न हो इसके लिए सबसे पहली व प्राथमिक कोशिश यही होनी चाहिए कि बैंकिंग नियामक अर्थात भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ऑडिट करने वाली संस्थाओं के साथ बैंकिंग प्रशासन की सामूहिक जवाबदेही सुनिश्चित की जाए ।

नीरव मोदी वाले मामले से सीख लेते हुए उच्च अधिकारियों के तबादले संबंधी नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित हो। इसके अतिरिक्त जरूरत इस बात की भी है कि दैनिक स्तर पर बैंकिंग लेन-देन की निगरानी हेतु विशेष अधिकारी की नियुक्ति हो। जवाबदेही और कार्यशैली में सुधार के लिए सार्वजनिक क्षेत्रों के निजीकरण करने की बजाय बैंकिंग सेक्टर के मैनेजमेंट में निजी भागीदारी को बढ़ावा दिया सकता है। बढ़ता एनपीए बैंकों की सर्व-प्रमुख चिंता है। फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट के अनुसार देश का एनपीए 9.6 फीसदी है यानी श्रीलंका जैसे देश के जीडीपी से दोगुना! इस नासूर से छुटकारे के लिए लोन लेने वाली की लोन चुकाने की क्षमता के साथ पूर्व कार्यों की निष्पक्ष जांच पर बल देना होगा और ज्यादा लोन की स्थिति में ‘लोन सीमा’ भी निर्धारित करनी होगी ।

इसमें कोई शक नहीं है कि हरित क्रांति से लेकर जन-धन खातों के माध्यम से गरीब तबके का वित्तीय स्तर पर समावेश करने तक बैंकिंग प्रणाली ने बहुत अच्छा काम किया है। निश्चित व नियमित अंतराल पर व्यापक और ईमानदार लेखा परीक्षण, निरीक्षण और प्रशासनिक स्तर पर नियुक्ति, पदोन्नति व स्थानांतरण में राजनीतिक हस्तक्षेप को न्यूनतम कर देश के आर्थिक-सामाजिक विकास की धुरी कही जाने वाली बैंकिंग व्यवस्था पर आम आदमी के भरोसे को कायम ही नहीं रखा जा सकता बल्कि बढ़ाया भी जा सकता है। 
Reviewed by Target IAS on July 09, 2019 Rating: 5

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